बुधवार, 6 जून 2012

maa chhinnmastika dham

मैं आज अपने लेखनी की शुरुआत कर रहा हूँ!

                                           माँ छिन्मस्तिका का मंदिर झारखण्ड राज्य के रामगढ जिले में अवस्थित है जो की बिहार , बंगाल, झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ के लोगो के बीच काफी  प्रसिद्ध  हैं !दस महाविद्याओ में से एक माँ छिन्नमस्तिका का मंदिर मेरे शहर बोकारो से 70 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है ! दामोदर -भैरवी नदी के संगम पर स्थित इस पीठ को शक्ति पीठ माना जाता हैं ! कहा जाता है की दामोदर  को शिव एवं भैरवी को शक्ति का रूप है ! यहाँ पर भैरवी नदी दामोदर के  साथ मिल जाती है जो की  संगम है संगम पर दामोदर नदी की गहराई का अनुमान आज तक नहीं लग पाया हैं !यह एक तांत्रिक पीठ है जो की साधक लोग हमेशा ही तंत्र साधना में लीन रहते है मां छिन्नमस्थिका का सिर कटा है, उनके गले के दोनों ओर से बहती रक्तधार को दो महाविधाएं ग्रहण करती हुई दिखाई गई है. मां के पांव के नीचे कमलदल पर लेटे हुए कामदेव तथा रति है. इस प्रतिमा के अलावा वहां आवरण में एक प्रतिमा है, जो मूल पुरातन प्रतिमा हे. यह मूल प्रतिमा कितनी पुरानी है. इसका कोई सही प्रमाण उपलब्ध नहीं है. यहां बकरे की बलि भी दी जाती है. बलि के बाद सिर पुजारी ले जाते है, और धड बलि देने वाले व्यक्ति को मिलता है. बलिसे जो भी रक्त फैलता है, उसपर मक्खी बिल्कुल नहीं लगती है. यह आश्चर्यजनक तथ्य है.   

रजरप्पा पहुंचने के लिए निकटस्थ रेलवे स्टेशन रांची तथा बोकारो  है. रांची  निकटतक हवाई अड्डा है. रांची, हजारीबाग, बोकारो  तथा धनबाद से रजरप्पा के लिये बसें मिलती है. सायं 5 बजे के बाद मंदिर से लौटने का साधन मुश्किल से मिलती है. अत: पहले से ही बुकिंग कराना सुविधाजनक रहता है.  

छिन्नमस्ता के प्राद्रुभाव की एक कथा इस प्रकार है- भगवती भवानी अपनी दो सहचरियों के संग मन्दाकिनी नदी में स्नान कर  रही थी. स्नान करने पर दोनों सहचरियों को बहुत तेज भूख लगी. भूख कि पीडा से उनका रंग काला हो गया. तब सहचरियों ने भोजन के लिये भवानी से कुछ मांगा. भवानी के कुछ देर प्रतिक्षा करने के लिये उनसे कहा, किन्तु वह बार-बार भोजन के लिए हठ करने लगी. 

तत्पश्चात सहचरियों ने नम्रतापूर्वक अनुरोध किया-"मां तो भूखे शिशु को अविलम्ब भोजन प्रदान करती है" ऎसा वचन सुनते ही भवानी ने अपने खडग से अपना ही सिर काट दिया.  कटा  हुआ सिर उनके बायें हाथ में आ गिरा और तीन रक्तधाराएं बह निकली. दो धाराओ को उन्होनें सहचरियों की और प्रवाहित कर दिया. जिन्हें पान कर दोनों तृ्प्त हो गई. तीसरी धारा जो ऊपर की  बह रही थी, उसे देवी स्वयं पान करने लगी. तभी से वे छिन्नमस्तिका के नाम से विख्यात हुई है!. 
  
माता छिन्नमस्तिका की मूर्ति  (फोटो गूगल चित्र से लिया गया है!) 
                              मैं अपने परिवार के साथ हमेशा शाम को ही जाता हूँ क्यूंकि एक तो दिन मैं काफी भीड़ रहती है ठीक से दर्शन भी नहीं हो पाता है, दूसरा शाम की माता का श्रृंगार एवं आरती बहुत ही अच्छी होती है आरती के बाद मन को इतनी तस्सल्ली मिलती है की जिसका वर्णन करना काफी मुस्किल होता है ! 
माता का मंदिर  (फोटो गूगल चित्र से लिया गया है!)
       आज के लिए इतना ही , माता छिन्मस्तिका आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करे! mere saath chaliye